पतझड़

पत्तों के रंगो मे खोई
पत्तो की बात सुनाती हूँ
आँखों ने जैसा देखा है
वैसा ही चित्र बनाती हूँ

कुछ पत्ते थे हरे अभी
ना शुरू हुई जवानी थी
कुछ पत्ते पूरे रंग मे थे
मदमाती मस्त कहानी थी

कुछ पत्ते हलके पीले थे
कुछ पत्ते गहरे पीले थे
कुछ लाल सुर्ख, कुछ केसरिया
पत्ते कितने रंगीले थे

कुछ पत्ते पेड़ों पर थे
रंगो को बिखराते थे
कुछ धरती पर गिरे हुए
जीवन की रीत निभाते थे

पत्तों के रंगो मे खोई
पत्तो की बात सुनाती हूँ
आँखों ने जैसा देखा है
वैसा ही चित्र बनाती हूँ

पत्तों को देखकर लगता था
इक इंदरधनुष अम्बर से गिर
इन पेड़ों पर छाया है
सतरंगो से बिखरा बिखरा
धरती का चित्र बनाया है

या आज विधाता ने मानो
पेड़ो से खेली होली है
भर पिचकारी मारी है
यह उसकी आज ठिठोली है

या एक अजूबा माली ने
पेड़ो को फूल बनाया है
पर्वत के आँचल मे मानो
गुलदस्ता आज सजाया है

या धूप बनी है महबूबा
पेड़ो को अंग लगाती है
इक इक पत्ते को छू छू कर
पत्तो को आग लगाती है

या मेरा प्यार निकल दिल से
सतरंगी बनकर आया है
मेरे अंदर के भावों को
इन पत्तों ने अपनाया है

है प्यार का रंग या पत्तों का
यह निर्णय ना कर पाती हूँ
पत्तों के रंगों मे डूबी
पत्तों की बात सुनती हूँ

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