ज्वालामुखी

एक् ज्वालामुखी को अंदर से देखा है
उसकी रूह को छूकर झाँका है जैसे,
दिन में कोहरे की सफ़ेदी,
रात में लाल अंगारे
कभी दिखे ओस, तो कभी ज्वालाएँ,

था कोहरे की सफ़ेदी में लिपटा,
और थी तपती हुई सूरज की अगन,
आतिशों की अठखेलियों में डूबा
तब थी शाम की ठंडी पवन,

सृष्टि की है यह रचना
इसकी गहराई में उतरो,
कोहरे के घूँघट से
एक अंगारा ढूँढो,
और अग्नि की ताप को
ओस से ओढ़ लो,

ज्वालामुखी अंदर से शांत तभी हो
अंतर्मन की सुनकर, तुम दृढ़ निश्चय लो,
धुँधले कोहरे की गाँठ बाँध कर
ठंडी ओस की बूँद थाम कर
विश्व-लोक में कुछ ऐसा कर
उस लाल आग से तुम प्रकाश दो